Rakshabandhan 2022 : उत्तराखंड का एक अनोखा मंदिर जो रक्षाबंधन को ही खुलता है

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Rakshabandhan 2022 : उत्तराखंड का एक अनोखा मंदिर जो रक्षाबंधन को ही खुलता है, जानिए क्या है मंदिर की मान्यताएं

चमोली :भारत में कई ऐसे मंदिर हैं, जिनसे अद्भुत और अनोखी बातें जुड़ी हुई हैं. इन्हीं में से एक मंदिर है, जो 364 दिन बंद रहता है और रक्षा बंधन के मौके पर ही श्रद्धालुओं लिए खुलता है. जानें इसके बारे में

भारत देश में अलग-अलग और अद्भुत संस्कृतियों ,धार्मिक रीति-रिवाजों का भी विशेष महत्व है. देश अपने अंदर एक अनूठी धार्मिक दुनिया बसाए हुए है, जहां हर धर्म के रिवाजों और पूजा-पाठ के तरीकों का सच्ची निष्ठा और भाव के साथ पालन किया जाता है. भारत भले ही ऐतिहासिक स्थलों से समृद्ध हो, लेकिन यहां के धार्मिक स्थल भी एक अलग कहानी  बयां करते हैं. यहां चर्चित से लेकर अनोखे रीति-रिवाज वाले कई धार्मिक स्थल मौजूद हैं. भारत में एक ऐसा अनोखा मंदिर है वंशीनारायण मंदिर

मान्यता है कि इस मंदिर में देवऋषि नारद 364 दिन भगवान नारायण की पूजा अर्चना करते हैं और यहां पर मनुष्यों को पूजा करने का अधिकार सिर्फ एक दिन के लिए ही है, एक बार राजा बलि ने भगवान विष्णु से आग्रह किया कि वह उनके द्वारपाल बने। भगवान विष्णु ने राजा बलि के इस आग्रह को स्वीकार कर लिया और वह राजा बलि के साथ पाताल लोक चले गए। भगवान विष्णु के कई दिनों तक दर्शन न होने कारण माता लक्ष्मी परेशान हो गई और वह नारद मुनि के पास गई। नारद मुनि के पास पहुंचकर उन्होंने माता लक्ष्मी से पूछा के भगवान विष्णु कहां पर है। जिसके बाद नारद मुनि ने माता लक्ष्मी को बताया कि वह पाताल लोक में हैं और द्वारपाल बने हुए हैं।

नारद मुनि ने माता लक्ष्मी को भगवान विष्णु को वापस लाने का उपाय भी बताया । उन्होंने कहा कि आप श्रावण मास की पूर्णिमा को पाताल लोक में जाएं और राजा बलि की कलाई पर रक्षासूत्र बांध दें। रक्षासूत्र बांधने के बाद राजा बलि से वापस उन्हें मांग लें। इस पर माता लक्ष्मी ने कहां कि मुझे पाताल लोक जानें का रास्ता नहीं पता क्या आप मेरे साथ पाताल लोक चलेंगे। इस पर उन्होंने माता लक्ष्मी के आग्रह को स्वीकार कर लिया और वह उनके साथ पाताल लोक चले गए। जिसके बाद नारद मुनि की अनुपस्थिति में कलगोठ गांव के जार पुजारी ने वंशी नारायण की पूजा की तब से ही यह परंपरा चली आ रही है।

मानव जाति को रक्षाबंधन के दिन ही है पूजा करने का अधिकार 

कहा जाता है कि इस मंदिर के कपाट साल में एक बार रक्षाबंधन पर ही खुलते हैं. रीति-रिवाजों के तहत यहां की महिलाएं और लड़कियां अपने भाईयों को राखी बांधने से पहले भगवान की पूजा करती हैं. ऐसा भी कहा जाता है कि यहां भगवान श्री कृष्ण और कल्याणकारी शिव की प्रतिमा मौजूद हैं. इस मंदिर से पौराणिक कथा जुड़ी हुई. मान्यता है कि विष्णु अपने वामन अवतार से मुक्ति के बाद सबसे पहले इसी स्थान पर प्रकट हुए थे. इसके बाद से देव ऋषि नारद भगवान नारायण की यहां पर पूजा करते हैं. इसी वजह से यहां पर भूलोक के मनुष्यों को सिर्फ एक दिन के लिए पूजा का अधिकार मिला है.

राजपूत जाति के लोग ही होते है इस मंदिर के पुजारी 

अधिकांश भारत में देखा जाता है कि यहाँ के मंदिरों या धार्मिक स्थलों में पुजारी ब्राह्मण जाति के ही होते है,लेकिन बंशीनारायण / वंशीनारायण मंदिर में पुजारी राजपूत जाति के होते है जो कि अपने आप में हैरत की बात है l मंदिर में पूजा सूर्योदय के बाद ही की जाती है और सूर्यास्त होने के ठीक पहले मंदिर के कपाट ३६४ दिन के लिए बंद कर दिए जाते है l

आसान नही है मंदिर तक पहुँचने का मार्ग 

इस मंदिर तक पहुंचना भी आसान नहीं है। यहां पहुंचने के लिए बद्रीनाय हाईवे से इलाद घाटी तक आठ किलोमीटर की दूरी वाहन से तय करनी पड़ती है। इसके बाद 12 किलोमीटर का मुश्किल रास्ता शुरू होता है। यह रास्ता बहुत ही ज्यादा उबड़खाबड़ है। जिस पर चलना अत्यंत ही कठिन हैl

कत्युरी शैली में बने 10 फिट ऊंचे इस मंदिर का गर्भ भी वर्गाकार है। जहाँ भगवान विष्णु चर्तुभुज रूप में विद्यमान है। इस मंदिर की खास बात यह है कि इस मंदिर की प्रतिमा में भगवान नारायण और भगवान शिव दोनों के ही दर्शन होते हैं। वंशी नारायण मंदिर में भगवान गणेश और वन देवियों की मूर्तियां भी मौजूद हैl

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