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Saturday, June 25, 2022
Homeउत्तराखंडराज्य आंदोलनकारी शहीदों की शहादत का अपमान,यहां की स्तिथि जस की तस

राज्य आंदोलनकारी शहीदों की शहादत का अपमान,यहां की स्तिथि जस की तस

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उत्तरकाशी, कुठार (सुनील राज)— उत्तराखंड निर्माण के लिए समूचे प्रदेश के लोगों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया, कई लोगों ने कुर्बानियां दी, बहुतेरे लोग शहीद हो गए। रामनगर तिराहा कांड हुआ, माँ बेटियों की इज्जत के साथ क्या हुआ किसी से छुपा नहीं है, मसूरी कांड में जानें गयी कई जगह लोगों ने बलिदान दिए ।

सिर्फ इसलिए कि अपना पहाड़ी राज्य होगा तो विकास की बयार आएगी, सड़कें बनेंगी स्वास्थ्य और शिक्षा सुदृढ़ होगा विकास के नए आयाम गड़े जाएंगे। “लेकिन हुआ इससे उलट” न सड़कें बनी नही शिक्षा, स्वास्थ्य के क्षेत्र में बदलाव आए न बेरोजगार युवाओं को उम्मीद के अनुरूप रोजगार मिले। और आज भी विकास की बाट जोहता ये उत्तराखण्ड कराह रहा है

कि कब स्थिति में सुधार आएगा। दरअसल हम बात कर रहे हैं उत्तराकाशी के कुठार गांव की जो 21 साल के युवा उत्तराखण्ड में आज भी 19वीं सदी जैसी जिंदगी जी रहा है। यमनोत्री से बमुश्किल 14 किलो मीटर की दूरी पर बसे इस गांव के लोग जो आज भी 7 किलो मीटर की खड़ी चढ़ाई पैदल चल कर गांव पहुंचते हैं।

सोचो कोई बीमार होता होगा तो कैसे सड़क तक पहुंचाते होंगे? गर्वबती महिला को प्रसव पीड़ा में कैसे अस्पताल तक पहुंचाते होंगे? राशन को घर तक कैसे पहुंचाते होंगे? घर बनाने के लिए ईंट, सरिया, सीमेंट कैसे पहुंचाते होंगे? परेशानियों का अंबार है। सरकार से सवालात भी अनेकों हैं?

समाधान का अभीतक कोई हल नहीं! इसबार यानी 2022 के होने वाले आम विधानसभा में को लेकर ग्राम पंचायत कुठार के लोगों ने चुनाव भहिष्कार का निर्णय लिया है, ग्रामीणों ने पंचायत कर फैसला लिया कि उनको हुक्मरानों ने बारी-बारी से ठगा। इस बार ओ नहीं ठगे जाएंगे। ग्रामीणों ने कहा कि राज्य बनने के बाद चार बार विधानसभा के चुनाव हुए जिसमें 2002 में पहली बार बने विधायक प्रीतम पंवार ने छलावा किया, 2007 में केदार सिंह को इसलिए वोट दिया कि वे कुठार तक सड़क पहुंचाएंगे, 2012 में प्रीतम को वोट दिया और वह कांग्रेस सरकार में मंत्री भी बने पर सड़क(मोटर मार्ग) तभी भी नहीं बनी, 2017 में ग्रामीणों ने फिर केदार सिंह रावत को वोट दिया जो वर्तमान में क्षेत्रीय विधायक हैं जिनका गांव लगभग कुठार की दूरी से 8 किलोमीटर दूर है। इस दफ़े ग्रामीणों ने निर्णय लिया कि अब नहीं ठगा जाना है। पंचायत कर ग्रामीणों ने मन बनाया कि यदि उनके गांव में कोई नेता वोट मांगने आएगा उसे आधे रास्ते से ही वापस लौटने को मझबूर होना पड़ेगा। ग्रामीणों ने साफ लफ़्ज़ों में जिला अधिकारी को पत्र लिखा है कि वे वो नहीं देंगे जबतक गांव में सड़क नहीं पहुंचती है। सरकार से सवाल है कि आखिर कब तक लोग ठगे जाते रहेंगे? कब तक राजनीतिक पार्टियों की लड़ाई में उलझे रहेंगे?? कब हुक्मरानों के कानों की जूँ रेंगेगी? कब नेताओं के कान का पर्दा खिलेगा?? कब धूल फांकती फाइलें सूर्य की किरणें देखेगी??? सवाल अनेक जवाब एक सड़क कब तक।

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